
“भू-माफियाओं का खेल या सिस्टम की मिलीभगत? 71 हेक्टेयर तक बढ़ी जमीन!”
कोरबा।जिले में जमीन से जुड़े मामलों में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं के बीच एक और चौंकाने वाला मामला उजागर हुआ है। खासकर मसाहती और आदिवासी क्षेत्रों की जमीनों में हो रहे हेरफेर ने राजस्व व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ताजा मामले में एक पटवारी द्वारा राजस्व अभिलेखों में जमीन का रकबा 100 गुना तक बढ़ाकर दर्ज कर देने की पुष्टि हुई है, जिसके बाद प्रशासन ने सख्त कार्रवाई करते हुए उसे तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।

जानकारी के अनुसार, राजस्व विभाग के कुछ मैदानी अधिकारी और कर्मचारी मिलीभगत कर सरकारी और आदिवासी जमीनों के रिकॉर्ड में छेड़छाड़ कर रसूखदार लोगों को फायदा पहुंचाने में लगे हुए हैं। कई मामलों में शिकायतें सामने आईं, लेकिन कार्रवाई सीमित ही रही। इसी क्रम में अब सामने आए इस नए मामले ने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कलेक्टर कुणाल दुदावत ने शासकीय कार्यों के प्रति लापरवाही और गंभीर अनियमितताओं को देखते हुए पटवारी दीपक कुमार सिंह को निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई तहसीलदार भैंसमा द्वारा प्रस्तुत जांच प्रतिवेदन के आधार पर की गई, जिसमें स्पष्ट रूप से पाया गया कि संबंधित पटवारी ने अपने पद के दायित्वों का निर्वहन करते हुए गंभीर लापरवाही बरती और नियमों का उल्लंघन किया।

जांच में सामने आया कि ग्राम करूमौहा में राजस्व रिकॉर्ड के साथ बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ की गई। खसरा नंबर 176/1/ख/1 की वास्तविक जमीन 0.016 हेक्टेयर थी, जिसे बढ़ाकर 1.600 हेक्टेयर दर्ज कर दिया गया। वहीं, एक अन्य मामले में खसरा नंबर 84/4 ख की जमीन 0.710 हेक्टेयर से सीधे 71.000 हेक्टेयर कर दी गई। सबसे गंभीर बात यह रही कि यह बदलाव बिना किसी वैध आदेश के ऑनलाइन भुइयां पोर्टल पर दर्ज कर दिए गए।
इस प्रकार की हेराफेरी न केवल सरकारी व्यवस्था को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि असली भूस्वामियों को न्याय के लिए दर-दर भटकने पर मजबूर कर देती है। मामले में यह भी जांच का विषय बना हुआ है कि आखिर यह सब किसके इशारे पर और किसे लाभ पहुंचाने के लिए किया गया।

इन गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं को देखते हुए छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के तहत कार्रवाई करते हुए पटवारी को निलंबित किया गया है। निलंबन अवधि के दौरान उनका मुख्यालय तहसील कार्यालय पसान निर्धारित किया गया है और उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता दिया जाएगा।
प्रशासन की सख्ती या सिस्टम की खामी?
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सिर्फ कुछ कर्मचारियों की लापरवाही है या फिर पूरे सिस्टम में गहरी जड़ें जमा चुका भ्रष्टाचार। फिलहाल प्रशासन की इस कार्रवाई को एक सख्त संदेश के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन यह भी जरूरी है कि ऐसे मामलों की गहराई से जांच कर जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।















